• Monday, September 26, 2022

    Navratri Vrat Katha in Hindi, नवरात्रि कथा | Hindi Story

    Navratri Vrat Katha in Hindi, नवरात्रि कथा | Hindi Story

    Navratri Vrat Katha in Hindi, नवरात्रि कथा | Hindi Story नमस्कार, स्वागत है आपका हमारे blog, Hindi Best Stories में, दोस्तों नवरात्रि आ रही है, तो आज हम आप को नवरात्रि कथा, Navratri Vrat Katha in Hindi मै बताएंगे। माँ दुर्गा अपने भक्तों पर किस प्रकार कृपा बनाती है। उम्मीद कर ता हु आप को ये कथा पसंद आयेगी।

    चलिये शुरू करते है Navratri Vrat Katha in Hindi


    प्राचीन काल में मनोहर नगर में, पीठक नाम का एक ब्राह्मण रहा करता था। वह माता भगवती दुर्गा का बहुत बड़ा भक्त था। उसकी एक बहुत ही सुंदर कन्या थी, जो संपूर्ण सद्गुणों से युक्त थी। उस कन्या का नाम सुमति था और वह अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुईं इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे की चन्द्रमा की काली बढ़ती है।

    उसके पिता प्रतिदिन माँ दुर्गा की पूजा करके हवन किया करते थे। और उस समय वो भी वहाँ उपस्थित होकर अपने पिता के साथ पूजा करती, सुमति एक दिन अपनी दोस्तों के साथ बहार खेल रही थी और भगवती के पूजा में मौजूद नहीं हो पाई। तब उसके पिता को अपनी पुत्री सुमति का ऐसा व्‍यवहार देखकर बहुत गुस्सा आया।

    उन्होंने अपनी पुत्री से कहा अरी दुष्ट पुत्री आज तुने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ट रोगी या दरिद्र के साथ तेरा विवाह करूँगा। अपने पिता का ऐसा वचन सुनकर सुमति को बहुत दुख हुआ और उसने अपने पिता से कहा। हे पिता मैं आपकी ही कन्या हूँ और सब तरह से आपके अधीन हु, जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो।

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    आप चाहे मेरा विवाह किसी से भी करदो, पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मेरा अटल विश्वास है कि हम जैसा कर्म करते हैं, हमें उसी के अनुसार फल मिलता है क्योंकि कर्म करना हम मनुष्य के अधीन है और फल देना उस ईश्वर के अधीन है। अपनी बेटी के इस प्रकार के शब्द सुनकर पिता - ब्राह्मण ने गुस्से में अपनी बेटी का विवाह एक बहुत कुष्ठ रोगी के साथ विवाह कर दिया और बहुत क्रोधित होकर अपनी पुत्री से कहने लगा।

    हे पुत्री अपने कर्म का फल भोगो और देखते है तुम अपने भाग्य के भरोसे रहकर क्या कर पाती हो? पिता के ऐसे कड़वे वचन सुनकर सुमति के मन में विचार आने लगा, की मेरा बहुत दुर्भाग्य है कि मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह कन्या अपने पति के साथ वन में चली गई और उन्होंने उस वन में वह रात बहुत ही कष्ट से बिताई।

    उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर माता भगवती उसके पूर्व पुण्य कर्मों के प्रभाव से प्रकट हो गईं, और उन्होंने सुमति से कहा, मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ तुम मुझ से जो चाहे वरदान मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुनकर सुमति ने कहा, आप कौन है? वह मुझे बताएं? यह सुनकर भगवती देवी ने कहा। मैं आदि शक्ति भगवती हूँ, मैं ही ब्रह्म विद्या और सरस्वती हूँ, प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों के दुख दूर कर देती हूँ और उनको सुख प्रदान करती हूँ मैं तुझ पर तेरे पूर्वजन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हु।

    तुम्हारे पूर्व जन्म में तुम एक भील की पत्नी थी और बहुत ही पवित्र औरत थी। एक दिन तेरे पति निषाद में चोरी की, चोरी करने के कारण, तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तुमको और तुम्हारे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्रि के दिनों में तुमने ना तो कुछ खाया और ना ही जल पिया। इस प्रकार नौ दिनों तक नवरात्र का व्रत हो गया।


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    हे ब्राह्मणी उन दिनों में जो व्रत हुआ इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें मनवांछित वर देती हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो मांग लो। इस प्रकार माता दुर्गा के वचन सुनकर सुमति ने कहा।अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे मैं आपको प्रणाम करती हूँ, अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके मेरे पति का कोढ़ दूर कर दीजिये। देवी ने कहा उन दिनों जो व्रत तुमने किया था, उस व्रत का एक दिन का पुण्य पति का कोढ़ दूर करने के लिए अर्पण कर दो। उस पुण्य के प्रभाव से तेरे पति का कोढ़ दूर हो जाएगा।

    इस प्रकार के वचन सुनकर सुमिति बहुत प्रसन्न हुई और उसका पति निरोग होकर बहुत ही सुंदर और कांतिवान हो गया। वह ब्राह्मणी पति की ऐसी काया देखकर देवी की स्तुति करने लगी और कहने लगी आप दूसरों की दुर्गति को दूर करने वाली, तीनों लोगों का सन्ताप हरने वाली, समस्त दुखों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न होकर मनवांछित फल देने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हो।

    मुझ निरपराध अबला को मेरे पिता ने एक कुश्ती मनुष्य के साथ विवाह कर कर घर से निकाल दिया, पिता की तिरस्कार से मैं वन में घूम रही हूँ और अब आपने मेरा उद्धार किया है। हे देवी मैं आपको प्रणाम करती हूँ, आप मेरी रक्षा करना। सुमति की ऐसी स्तुति सुनकर देवी बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने उसको अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्र ये पुत्र शीघ्र उत्पन्न होगा ऐसा वर दिया। तो इस प्रकार देवी भगवती ने सुमति पर कृपा करी, जैसी कृपा माता ने सुमति पर करी ऐसी कृपा वो सब पर करे, जय माँ दुर्गा।


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    नवरात्री स्पेशल कहानी - Navratri Vrat Katha in Hindi

    एक गांव में सरिता नाम की एक महिला रहती थी। वह माता रानी की बहुत बड़ी भक्त थी, उसकी एक बेटी भी थी, जिसका नाम मधु था। वह माँ बेटी बहुत ही गरीब थे और बड़ी मुश्किल से अपना जीवन बिता रहे थे। सरिता सड़क पर झाड़ू लगाने का काम करती, जिससे उसका दो वक्त के खाने का इंतजाम हो पाता था। सरिता पूरे नवरात्री रखती और उद्यापन भी अपने सामर्थ के हिसाब से कर देती थी।

    इस बार जब नवरात्रि आई तो मधु ने अपनी माँ से कहा, माँ मैं भी इस बार तुम्हारे साथ नवरात्रों का व्रत रखूंगी। यह सुनकर सरिता ने कहा मधु तुम अभी बहुत छोटी हो, तुम व्रत कैसे रख पाओगी? मधु बोली माँ, जिस तरह तुम व्रत रखती हो उस तरह मैं भी रख लुंगी और दोनों माँ बेटी माता के व्रत पूरे विधि विधान से रख रही थी।

    एक दिन वो दोनों पूजा की थाली लेकर मंदिर गयी जब दोनों मंदिर पहुंची तो पुजारी ने उन्हें मंदिर के अंदर घुसने नहीं दिया, लेकिन तभी मधु ने चुपके से माता के चरणों में एक फूल चढ़ा दिया फिर दोनों वहाँ से चली गई। अगले दिन जब पुजारी ने मंदिर के कपाट खोले तो उसने देखा कि माता रानी पर चढ़ाई गई सभी फूल सूख चूके थे, पर एक ही फूल पूरी तरह ताजा था। यह देखकर पुजारी हैरान रह गया कि ऐसा कैसे हो सकता है।

    तभी वहाँ सरिता और मधु फिर से मंदिर आ गए पुजारी उन दोनों पर बहुत क्रोधित हुआ और सभी से कहने लगा की ये दोनों नीच जाति की है और इनके मंदिर में आ जाने से मंदिर अपवित्र हो जाएगा। लोगों ने यह सुनते ही सरिता को बहुत मारा, सरिता बेहोश हो गई यह देखकर मधु बहुत ज़ोर से रोने लगी, तभी बहुत तेज आंधी के साथ एक आकाशवाणी हुई, की सरिता और मधु मेरे भक्त हैं और वह फूल इनका ही चढ़ाया हुआ है, जो अभी तक ताजा हैं इन दोनों ने सच्चे मन से मेरी भक्ति की है।


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    सभी ने ये सुनकर सरिता और मधु से माफी मांगी। जब सारे नवरात्र पूरे हुए तो सरिता ने अष्टमी पूजन किया और माता रानी का भोग बनाया और फिर उन्हें भोग लगाया। जैसे ही भोग लगाकर दोनों व्रत खोलने बैठी वैसे ही बहार से एक आवाज़ आई, बेटी मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को दे दो, दो दिन से कुछ नहीं खाया आवाज सुनते ही सरिता ने बाहर आकर देखा तो बाहर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सरिता और मधु ने सारा खाना उस बूढ़ी औरत को दे दिया और वो दोनों थोड़ा बहुत जो भी था खाकर रह गई।

    जब वह बूढ़ी औरत जाने लगी तो वह एक पोटली सरिता को दे गयी और बोली इसको मंदिर में रख लेना, विजय दशमी वाले दिन ही इसको खोलना ऐसा कहकर वो चली गयी। विजय दशमी वाले दिन पूजा करने के बाद सरिता ने जब वो पोटली खोली तो उसमें से हीरे जवाहरात निकले। सरिता समझ गई कि वह बूढ़ी औरत कोई और नहीं स्वयं माता रानी थी। उन दोनों ने हाथ जोड़कर माता रानी के आगे सर झुक आया और दोनों माँ बेटी उस दिन से खुशी खुशी अपना जीवन बिताने लगी।

    उन दोनों के पास अब किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, इस कहानी में जिस तरह माँ दुर्गा ने सरिता और मधु का भला किया, उसी तरह माँ दुर्गा सभी की मनोकामनाएं पूरी करे। जो सच्ची श्रद्धा से मातारानी की पूजा करता है माँ सदा उनके साथ रहती है, जय माता दी।

    उम्मीद करता हूं दोस्तों आप को Navratri Vrat Katha in Hindi, नवरात्रि कथा पसंद आई होगी। और भी कथा के लिये आप post के नीचे comment करे। तो मिलते हैं अगली post में नई जानकारी के साथ।


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